रात के ठीक 2 बजे थे। मैं अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था क्योंकि कल ऑफिस में एक ज़रूरी प्रेजेंटेशन देनी थी। तभी दरवाजे पर हल्की सी थपथपाहट हुई।
पहले तो मुझे लगा कि शायद हवा के झोंके से कोई चीज़ गिरी होगी। लेकिन फिर वही आवाज़… थप… थप… थप।
मैं उठा और दरवाजे की ओर बढ़ा। आईहोल से झाँका तो सामने मीरा भाभी खड़ी थीं। मेरी पड़ोसन। लेकिन उनकी हालत देखकर मैं सकते में आ गया।
उनके कपड़े फटे हुए थे। चेहरे पर खरोंचें थीं। आँखों में डर साफ़ झलक रहा था।
मैंने झट से दरवाजा खोला। “भाभी! आप… ये क्या हुआ?”
वो अंदर आईं और दरवाजा बंद करते हुए बोलीं – “अर्जुन, प्लीज़… कल सुबह तक किसी को मत बताना कि मैं यहाँ हूँ। किसी को भी नहीं।”
“लेकिन भाभी, आपको चोट लगी है। मैं डॉक्टर को बुलाता हूँ या—”
“नहीं!” उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। “कोई नहीं आना चाहिए। बस मुझे आज रात यहाँ रुकने दो। सुबह मैं सब समझा दूंगी।”
मैंने उन्हें सोफे पर बिठाया। पानी का गिलास दिया। उनके हाथ काँप रहे थे।
“भाभी, कम से कम ये तो बताइए कि आपको किसने—”
“मेरे पति ने।” उन्होंने धीरे से कहा।
मैं स्तब्ध रह गया। राजीव भैया ने? वो तो इतने शांत और सज्जन इंसान लगते थे।
“लेकिन क्यों?” मैंने पूछा।
मीरा भाभी ने अपना बैग खोला और एक पुराना लिफाफा निकाला। उसमें कुछ तस्वीरें और दस्तावेज़ थे।
“क्योंकि आज मुझे ये मिल गया।” उन्होंने लिफाफा मेरी तरफ बढ़ाया।
मैंने लिफाफा खोला। पहली तस्वीर देखते ही मेरी सांस रुक गई।













